शायद तुम रास्ता बनाना चाहते थे
शायद तुम पूर्ब कि और चलना चाहते थे
शायद तुम इंसान ढूंढ़ने निकले थे
और आज कितना बिखरे हुये
हालाँकि तुम ईतना ऊंचा उठ गये हौ के
मुझे भी डर लगता है
जब गिरगे
सब कूच लेके
वह सँभालने मे
कितने साल
कितने हात
कितने आह
लगेगा ?
[Translated By: Suvajit Mondal]
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